पूर्वजों की संस्कृति संवारती लोककला

भारत में धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक मकसद के हिसाब से लोक माध्यमों और पारंपरिक कलाओं का बोलबाला रहा है। लोक माध्यम से तात्कालिकता और हास्य का बखूबी से इस्तेमाल किया जाता है। यदि हम हकीकत में देखें तो लोक कलाएं ज्ञान और मंच को स्थापित करती है। हम मीडिया की दृष्टि से देखें तो यहां लोक कलाएं दर्शकों को सरकारी या गैर सरकारी कार्यप्रणाली को प्रस्तुत करती हैं। लेकिन, लोककला  में यह बात ध्यान रखना जरूरी होती है कि यह माध्यम अब अभद्र नहीं बन जाए,  क्योंकि आधुनिकीकरण में लोक कलाओं के प्रति सम्मान का भाव कम होता जा रहा है, जिसे हमें खासा ध्यान रखने की जरूरत है। लोक माध्यम सीधे लोगों से जुड़े हुए होते हैं। वह दिमाग तक जल्दी पहुंचते हैं, और उनका जो असर होता है वह बहुत गहरा होता है। क्योंकि विशेषकर इसमें स्थानीय बोली पर ध्यान दिया जाता है। यहां पर कम्युनिकेशन यानी संचार के दौरान होने वाली बाधा न के बराबर होती है। लोक कलाओं का विशेष फायदा यहां रहता है। छोटे से लेकर बड़ो तक, हर उम्र के शख्स तक अपना मैसेज या संदेश पहुँचता है। इसके माध्यम से बताए जाने वाले सन्देश आत्मसात करने वाले होते हैं। जैसे सामाजिक मुद्दों पर तमाशा और जात्रा अग्रणी है। भारतीय लोक माध्यमों में संगीत, हास्य, नैतिकता और प्रार्थना का विशेष रूप से समावेश होता है। हां यह जरूर है की एक ही समय में निर्धारित लोगों को ही संबोधित कर पाते हैं, लेकिन जो लोग वहां मौजूद होते हैं उन तक गहरा प्रभाव छोड़ जाते हैं।  कीर्तन आल्हा नुक्कड़ नाटक इसका उदाहरण है। आजकल हम देखते हैं कई बड़े TV चैनल भी नाटक के जरिए किसी चीज को या किसी मसले को समझाने की कोशिश करते हैं। लोक कलाओं से हमारे पूर्वजों की संस्कृति को भी संवारा जा रहा है,  क्योंकि इसमें नैतिक दिशा-निर्देश होते हैं । यह भी एक प्रकार का जनसंचार माध्यम है,  जिसकी पहुँच देश की बड़ी संख्या में विराजित आबादी के अनुभव पर आधारित होती है।  देश के हर राज्य, केंद्र शासित प्रदेश में रहने वाले लोग चाहे वह किसी भी धर्म, जाति या भाषा ही समुदाय के हो, उनमें लोक कला शामिल है। निजी संगठन भी आजकल लोग माध्यमों का प्रयोग करते हैं। देश में गीत और नाटक प्रभाग सबसे बड़ी संस्था है जो लोक माध्यमों से जुड़ी हुई होती है। यह भारत सरकार की सूचना प्रसारण मंत्रालय की ही इकाई है। मंत्रालय के प्रकाशन इस इकाई को लाइव मीडिया विंग कहते हैं, जो पारंपरिक एवं अन्य कलाओं को सामाजिक संचार करता है । यह शहर की तुलना में गांवों में ही ज्यादा सक्रिय हैं। उसका मुख्यालय दिल्ली में है। प्रभाग के पास 40 मंडलियां है। इसके अलावा हम देखते हैं कि गांवों में भी कई सरकारी कार्यालय द्वारा अपनी योजनाओं के प्रचार प्रसार के लिए नाटक नुक्कड़ का सहयोग लिया जाता है।

प्रेस रेगुलेशन : राजा राम मोहन राय ने विरोध में बंद कर दिया अपना प्रकाशन


अखबार को नियमों में बांधने वाले प्रेस रेगुलेशन एक्ट 1799 में लागू किया गया था। इसके विरोध में राजा राम मोहन राय ने अपना प्रकाशन बंद कर दिया था। इस प्री सेंसरशिप ने कई सालों तक समाजसेवी पत्रकारों को उलझाकर रखा। उनका पीछा नहीं छोड़ा। इसी रेगुलेशन में यह अनिवार्य किया था कि अखबार के पेज पर मुद्रक, संपादक और मालिक का नाम लिखना अनिवार्य है। यह तो ठीक था, लेकिन इसमें एक नियम ऐसा जोड़ा कि जो किसी को पचा नहीं। जिसमें सरकार के सचिव को अखबार छपने से पहले प्रकाशित होने वाली सामग्री जांच के लिए भेजनी थी।

राजा राम मोहन राय ने भारतीय भाषा में पारसी पत्र मीरात उल अखबार प्रकाशित किया था। इस अखबार के शुरू करने के पीछे उद्देश्य सामाजिक स्तर को सुधारना था। उन्होंने इसी अखबार के माध्यम से लोगों को सरकार की योजनाओं से संबंधित जानकारी दी। भारतीय भाषायी में समाचारपत्रों की बात करें तो इसकी शुरुआत ईसाई मिशनरियों से हुई। विलियम कैरी ने समाचार दर्पण नाम से भारतीय भाषा का अखबार निकाला।
गुजराती भाषा में 1822 को बांबे समाचार प्रकाशित हुआ। इसके आठ साल बाद ही 1830 में मुंबई वर्तमान, 1831 में जां-ए-जमशेद और इसके 19 साल बाद बांबे दर्पण शुरू किया गया। 1839 तक बांग्ला के 9 अखबार थे। 6 दैनिक ब्रिटिश अखबार थे। खास बात यह है कि इस दौरान ब्रिटिश अखबारों की कुल संख्या 26 थी। उत्तर पश्चिम से एक हिंदू और एक उर्दू अखबार था। हालांकि अंग्रेजी सरकार के युग में वही अखबार सफल हो पाए जो उनके अनुसार चलते थे। कई अखबार मालिकों को अपना प्रकाशन आर्थिक कठिनाई के साथ सरकार के सख्त नियमों के कारण बंद करने पड़े। सरकार ने उन्हीं अखबारों को टिकने दिया जो उनकी प्रशंसा किया करते थे। दूसरी बात यह भी थी कि उस दौरान सफल रहने वाले अधिकांश अखबार अंग्रेजों के हाथ में थे।

आठ आने में मिलता था उदंत मार्तंड


प्रतिवर्ष 30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है। यह दिन इसलिए खास है, क्योंकि इसी दिन हिंदी पत्रकारिता का उदभव हुआ था। 30 मई 1826 में साप्ताहिक अखबार उदंत मार्तंड कोलकाता से प्रकाशित हुआ। यह पहला हिंदी अखबार था। पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने इस अखबार को शुरू कर साहस का काम किया। वह कानपुर निवासी थे।
उन्होंने अपने पहले अंक में लिखा था उदंत मार्तंड हिंदुस्तानियों के हित में प्रकाशित है, जो आज तक किसी ने नहीं चलाया। अंग्रेजी, पारसी और बंगला में समाचार का कागज छपता है, उसका सुकून इन बोलियों को जानने वालों को ही होता है। इससे सत्य समाचार हिंदुस्तानी लोग पढ़े और समझ ले, पराई अपेक्षा न करें और अपनी भाषा की उपज ना छोड़ें।
उदंत मार्तंड आठ आने में मिलता था। इसकी मासिक कीमत ₹2 रुपए थी। लेकिन, ब्रिटिश सरकार की तानाशाही शक्ति और आर्थिक संकट के चलते 1827 में इस अखबार को बंद करना पड़ा। यह अखबार 18 महीने तक ही प्रकाशित हो पाया।
उदंत मार्तंड के अंतिम अंक में लिखा था -
आज दिवस लौं उग चुक्यौ मार्तण्ड उदंत
अस्ताचल को जात है दिनकर दिन अब अंत।


चार भाषाओं में निकलता था बंगदूत
1830 में 4 भाषाओं में हिंदी साप्ताहिक अखबार बंगदूत प्रकाशित होने लगा। राममोहन राय ने इसे अंग्रेजी, बंगला, हिंदी और फारसी में कोलकाता से निकाला। राजा शिवप्रसाद ने हिंदी पत्र बनारस अखबार 1846 में निकाला।
आधुनिक हिंदी की नींव रखने का श्रेय भारतेंदु हरिश्चंद्र को जाता है। वह हिंदी के लेखक थे। उन्होंने 1868 में साहित्यिक पत्रिका कवि वचन सुधा निकाला। हिंदी का पहला दैनिक समाचार पत्र 1854 में समाचार सुधावर्षण निकला। इसके संपादक श्याम सुंदर सेन थे। हिंदी पत्रकारिता आने के बाद अंग्रेजी पत्रकारिता का दबदबा खत्म होता हुआ साफ दिखाई दे रहा था। हम आज भी देख सकते हैं हिंदी पत्रकारिता अंग्रेजी पत्रकारिता से काफी आगे बढ़ चुकी है।





व्यापार का केंद्र था कोलकात्ता, इसलिए अखबारों की हुई यहां से शुरुआत

भारत में यूरोपीय लोगों के आने के साथ ही समाचार पत्रों का इतिहास भी शुरू होता है। सबसे पहले प्रिंटिंग प्रेस लाने का श्रेय पुर्तगालियों को को दिया जाता है। 1557 ईस्वी में गोवा के कुछ पादरी लोगों ने भारत की पहली पुस्तक छापी थी। 1684 ईस्वी में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत की पहली अपनी पुस्तक की छपाई की थी। 1684 ईस्वी में कंपनी ने भारत में प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना की। 18वीं सदी के अंत तक भारत के लगभग ज्यादातर नगरों में प्रेस स्थापित हो गए थे। भारत में सबसे पहले 29 जनवरी 1780 में जेम्स आगस्टस हिक्की ने सबसे पहला अखबार बंगाल गजट निकाला था, जिसे कलकत्ता जनरल एडवाइजर के नाम से भी जाना गया।

हिक्की ने अपने अंक में लिखा था कि मुझे अखबार छापने का विशेष चाव नहीं है, ना मुझमें इसकी योग्यता है .......। मुझे अपने शरीर को कष्ट देना स्वीकार है, ताकि मैं मन और आत्मा की स्वाधीनता प्राप्त कर सकूं। इसके बाद 1780 में ही इंडिया गजट का प्रकाशन हुआ। इस अखबार में केवल ईस्ट इंडिया कंपनी की व्यावसायिक गतिविधियों का समावेश रहता था। कोलकाता अंग्रेजों का प्रमुख व्यापारिक केंद्र था। यहां बंदरगाह भी था। इसी वजह से अखबारों की शुरुआत यहां से हुई।
18वीं सदी के अंत तक बंगाल से कोलकाता कॉरियर, मुंबई से बंबई समाचार प्रकाशित हुआ। इसी दौरान मद्रास कॉरियर चेन्नई से प्रकाशित हुआ। इसी बीच 1799 में सबसे पहला प्रेस एक्ट आया। यह भारत का पहला एक्ट माना जाता है। जिसे सर वेलेजली ने लागू किया।
1819 में भारतीय भाषा में पहला समाचार पत्र संवाद कौमुदी प्रकाशित हुआ। राजा राममोहन राय ने बंगाली भाषा में इसे छापा था। इसके बाद 1822 में ही मिरात उल अखबार का प्रकाशन भी राजा राममोहन ने किया। 1822 में ही गुजराती भाषा से मुंबई ना समाचार शुरू हुआ। भारतीय भाषा का यह सबसे पुराना समाचार पत्र है

इतिहास की अगली कड़ी जारी रहेगी...

इंटरव्यू : पढ़ने वाले को प्रश्न में नहीं जवाब में होती है रुचि



पत्रकारिता के इस कॉलम में आज की पोस्ट इंटरव्यू अथवा साक्षात्कार पर हम बात करेंगे। पत्रकार के लिए इंटरव्यू महत्वपूर्ण विषय है, लेकिन इसकी बारीकियां जानना आम पाठक के लिए भी बेहतर है। भले वह किसी अखबार या मीडिया माध्यम के लिए काम नहीं करता हो, लेकिन जिंदगी में वह भी दूसरों से नहीं तो अपनों का ही इंटरव्यू तो लेता ही है। इसी परिप्रेक्ष्य में एक अच्छे साक्षात्कार के लिए जरूरत और ध्यान देने वाली बातों का सार काफी मंथन के बाद प्रस्तुत है।

इंटरव्यू और साइकॉलोजी का परस्पर संबंध है। इंटरव्यू लेने वाले को सबसे पहले तो सामने वाले को समझने की जरूरत होती है। उसकी साइकॉलोजी के आधार पर ही इंटरव्यू लिया जाए तो वह सफल मायने रखता है। इंटरव्यू हमारे बारे में नहीं होता, इसलिए इसमें हमारे विचार कभी नहीं जोड़ने चाहिए। प्रश्न बड़े हो सकते हैं। इसमें जानकारियां भी जुटाकर जोड़नी चाहिए। लेकिन, स्वयं के विचार हावी न हो जाए, यह ध्यान रखना भी जरूरी है।
घिसे-पिटे प्रश्नों को पूछने से बचने के साथ ही रूटीन के प्रश्न नहीं पूछने चाहिए। इससे हो सकता है इंटरव्यू देने वाले की रुचि कम हो जाए। इसके लिए बेहतर तरीका यही है कि हम जिसका इंटरव्यू लेने जा रहे हैं, उसके संबंध में पूरी जानकारी जुटा दें। प्रश्न किस विषय में पूछने हैं, उसकी पूरी तैयारी करके इंटरव्यू लेना ही बेहतर रहता है। खासकर इस दौरान हमारा परिधान भी मायने रखता है। एक अलग पहचान आकर्षिक करती है। इससे हमारे प्रश्नों को तवज्जो भी ज्यादा मिलती है। हमारा व्यक्तित्व इंटरव्यू देने वाले पर प्रभावी होता है।
अच्छे इंटरव्यू के अति उत्साही और ओवर स्मार्ट को कोसों दूर रखना ही फायदेमंद है। अनावश्यक एटीट्यूड एक सफल इंटरव्यू को रोक सकता है। ज्वलंत और संवदेनशील मुद्दों के लिए सहानुभूति रखना जरूरी होता है। जरूरत से ज्यादा निर्देश देने से भी बचना चाहिए। कठिन प्रश्नों से पूछने से पहले सहमति लेना बेहतर रहता है।
राय मनवाने से बचें- अक्सर देखा गया है कि इंटरव्यू लेने वाला यह चाहता है कि वह जो कहे वो सामने वाला स्वीकार कर ले, लेकिन यह गलत है। हमें निष्पक्ष बनना है। हमारे विचारों को निष्पक्षता के साथ प्रस्तुत करता है। हमारी राय को मनवाने से बचना चाहिए। किसी भी विषय में न तो हमें हमारा निर्णय लेना है और ना ही तीखी समीक्षा करनी है। हमारा हक केवल पूछना है, सामने वाले का बताना।
अक्सर अंतिम क्षणों में मिलती है बेहतर जानकारी : यह भी एक आश्चर्य है। अक्सर देखा गया है कि इंटरव्यू पूरा लेने के बाद जब हम हमारी डायरी या रिकॉर्डर दूर रख देते हैं, तब बड़ी जानकारी मिल जाती है। इंटरव्यू देने वाले उस समय हमारे बीच घुल-मिल जाता है और उस वजह से वह अंतिम क्षणों में बड़ी जानकारी दे देता है। इसलिए इंटरव्यू पूरा होने के बाद तुरंत चलते न बनें। थोड़ी देर रुकें। यह बात जरूरी है कि आप विनम्र बने रहें।
प्रश्न छूट जाए तो - कई बार इंटरव्यू खत्म होने के बाद ख्याल आता है कि यह प्रश्न तो पूछना ही रह गया या यह प्रश्न पूछा जाना चाहिए था। उस समय विनम्रता से इंटरव्यू देने वाले से बातचीत करने लग जाएं। और बातों बातों में ही वह प्रश्न पूछ लेना चाहिए।

सरल भाषा ज्यादा प्रभावशाली


लेख हो या समाचार सरल भाषा ही उसको ज्यादा प्रभावशाली बना सकती है। क्लिष्ट भाषा शब्दों को बोझिल बना देती है। वह शब्द की तारतम्यता को जोड़ने की बजाए कम करने में सहायक बन जाती है और लेखक कभी यह नहीं चाहेगा।
बेहतर लेख लिखने के लिए सरल भाषा सबसे सुगम उपाय है। लेखक अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए कई बार मुहावरों का प्रयोग करता है, लेकिन यह मुहावरे इतने जटिल बन जाते है कि उद्देश्य पूरा नहीं हो पाता। 

सरल भाषा के लिए छोटे-छोटे वाक्य लिखने के प्रयास होने चाहिए । साहित्यकारों के लिए यह विषय कुछ हद तक अलग हो सकता है, लेकिन मीडिया क्षेत्र में सरल भाषा बेहतर रिजल्ट दे सकती है।
आप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही देखिए । उनकी भाषा सरल और आम बोलचाल वाली है। वह आसानी से अपने विचारों को रख देते हैं। यानि जितने आसान शब्द होंगे, उतना ही पाठकों और श्रोताओं के लिए समझना आसान होगा।
अक्सर देखा गया है कि लंबे पैराग्राफ और बढा-चढा कर लिखना पाठकों को पसंद नहीं आता। ज्यादातर लेखक मानते हैं कि गंभीर मसलों पर कठिन शैली और भाषा जरूरी होती है। जबकि उसे इतना सरल भाषा में लिखना चाहिए कि पाठक इसके हर पहलू को आसानी से समझ सके।
मीडिया सेक्टर में आजकल छोटे वाक्यों और सरल भाषा पर ही जोर दिया जा रहा है। मीडिया सेक्टर अपने कर्मचारियों को सरल भाषा के लिए विशेष प्रशिक्षण भी दे रहा है, ताकि वह अखबार को इतना सरल बना सके कि पाठक हर खबर पर टिक सके। उसे समझने में ज्यादा दिमाग नहीं लगाना पड़े। क्योंकि पाठक को खबर पढ़ने के लिए दिमाग लगाना पड़ा तो वह हमारे अखबार या मैग्जीन को पूरा पढ़े, यह संशय भरा रहेगा। सरल भाषा होगी तो समय कम लगेगा, जिस वजह से वह हमारे प्रॉडक्ट की अन्य सामग्री भी पढ़ सकेगा।
हमारे प्रॉडक्ट पर ज्यादा से ज्यादा समय पाठक बिताए, इसके लिए सरल भाषा और छोटे-छोटे वाक्यों का इस्तेमाल करना जरूरी हो जाता है।



एक बेहतर प्रेस विज्ञप्ति लिखें, जिससे पत्रकार भी आकर्षित हों

आजकल अक्सर अखबारों के दफ्तरों में प्रेस विज्ञप्ति को लेकर शिकायत आती हैं, जिसमें नहीं छपना, छोटी छपना वगैरह-वगैरह शामिल है। इसके पीछे खराब प्रेस रिलीज़ करना भी शामिल है।
आमलोगों का जवाब रहता है कि यह काम तो पत्रकार ही कर सकते हैं। लेकिन, वाकई में यह तो पत्रकार का काम ही नहीं। वह तो खबर लिखेगा। प्रेस रिलीज तो आम पाठक का ही नजरिया है।
प्रेस विज्ञप्ति लिखना आसान है। इसमें केवल कुछ तथ्यों पर पकड़ होना जरूरी है। हिंदी की समझ रखने वाला व्यक्ति यह आसानी से यह कर सकता है। यहां मैं मात्राओं का दोष कहीं भी नहीं मढ़ रहा।
आप जो प्रेस विज्ञप्ति लिख रहे हो, उसका मीडिया टारगेट पता लगाएं। यानी कोई साप्ताहिक अख़बार है, इसमें आप एक ही संगठन की 3-4 दिन के अंतराल में 2-3 खबरें रिलीज करोगे तो वो प्रकाशित एक ही करेगा। आप लोकल आयोजन को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में रिलीज करोगे तो हो सकता है वहां टेलीकास्ट न हो।
खबर पहले से ही छोटी बनाएं। आवश्यक बिंदुओं को ही जगह दें। आंकड़े जरूर शामिल करें। आप बैठक की खबर ही बना रहे हो तो उसमें नई बात पहले लिखें, ताकि पत्रकार इस पर रुके और उसे रोचक लगे। रिलीज के अंत में अपने दल का नाम, कॉन्टैक्ट नंबर, -मेल भी लिखें। खासकर यह ध्यान रखें कि जो फोटो आप दे रहे हो वह हाई रिसोल्यूशन हो। पत्रकार को कभी मांगने का मौका नहीं दें।
प्रेस रिलीज करना एक प्रकार से पीआर का काम करना ही है। इसलिए इसमें सही तरीका और आवश्यक बातें ही होनी चाहिए, ताकि पत्रकार इससे आकर्षित हो और उस रिलीज को अच्छी जगह मिल सके।
कई बार प्रेस रिलीज में नामों पर भी बड़ी दिक्कत होती है। कई विज्ञप्तियों में नाम पहले और खबर बाद में होती है। यह बिल्कुल गलत है। नाम अंत में ही डालें। खासकर नाम प्रमुख हो वही लिखें। अक्सर देखा गया है कि खबर दो लाइन की और नाम पांच लाइन में लिखे होते हैं। ढेरों नाम आपकी रिलीज को बिगाड़ देती है। कम नाम और अधिक जानकारी वाली विज्ञप्ति को हर अखबार में अच्छी जगह मिलती है।
मैं इसे उदाहरण स्वरूप समझाना चाहूंगा। न्यूज रूम में हमेशा पत्रकार खबर की खोज के लिए विचाराधीन होता है। अक्सर प्रेस रिलीज इसमें उनको सहयोग भी करती है। जैसे एक बैठक की खबर है, जिसमें लिखा गया है कि अमुक समाज की बैठक इस दिन होगी। इसमें यह अतिथि भाग लेंगे। लेकिन, वास्तव में यह होना चाहिए कि इस बैठक को आयोजित करने के क्या कारण हैं। इसमें कोई ऐसा कारण भी हो दूसरी समाजों के लिए भी प्रेरणा बन सके तो वह बड़ी खबर का रूप ले लेगी। कभी-कभी बैठक में भी बड़े निर्णय लिए जाते हैं। लेकिन, प्रेस रिलीज में हम महज चार-पांच शब्दों में इसे बता देते हैं, जिसकी वजह से वह निर्णय अन्य समाजों के सामने नहीं आ पाते। इसलिए यह छोटी-छोटी बातें प्रमुखता से ली जाए तो प्रेस रिलीज अच्छी जगह बना सकती है।

एक उदाहरण :
पहले यह खबर प्रेस रिलीज के माध्यम से प्रकाशित हुई थी। 


 यहां की एक लाइन से हमने दूसरी खबर निकाली। 


 
विचारों की तारतम्यता जारी रहेगी...

समाचार लेखन


रूटीन के अलावा वर्तमान परिप्रेक्ष्य में चल रहे मुद्दों पर खबर होनी चाहिए। खबर पाठक के लिए रुचिकर हो और साथ ही इसका विषय अर्थपूर्ण हो। कुल मिलाकर पाठक उस खबर पर टिकना चाहिए। वह समय निकालकर इस खबर को पढ़ने के लिए मजबूर हो।
किसी भी खबर को लिखने से पहले इसका शोध जरूरी है। संबंधित आंकड़ों को खंगालना जरूरी होता है। समाचार लिखने से पहले तथ्यों को एकत्रित करना जरूरी होता है।
हर खबर में भी लेखक के अपने खुद के विचार शामिल होना स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन, इसके तहत ध्यान रखना यह जरूरी है कि वह संक्षेप में हो। ऐसा नहीं होने पर वह खबर की जगह संपादकीय पेज का लेख बन जाएगा।
रिपोर्टर (खबर का कवरेज करने वाला) यदि मुद्दे की खबर बनाता है तो वह पहले खुद तय करें कि यह क्यों महत्वपूर्ण है। इसके बाद वह खबर के माध्यम से भी पाठक को अवगत कराएं। समाचारपत्र की दुनिया में भी विरोधी तो होता ही हैं। ऐसे में अपना पक्ष तथ्यों के साथ रखना जरूरी होता है। यदि विपक्ष अच्छा कवरेज करे तो यह भी जरूरी है कि उसे स्वीकार करें, जिससे हमारा पक्ष अगली कड़ी में और तर्कपूर्ण होगा।




जुनून और शब्दों की पकड़ का नाम पत्रकारिता

पत्रकारिता : यह एक सभ्य व्यवसाय है। जिसमें जुनून आवश्यक है। पत्रकारिता शब्द हमारे जहन में आते ही हमें अखबार की दुनिया याद आती है। बेशक, आए भी क्यों नहीं। पत्रकारिता विषय विस्तृत है। इसमें एक ही नहीं समूचा उससे जुड़े हुए कई व्यवसाय है। फिल्म उद्योग भी इस शब्द की परिक्रमा से ही चलता है। पत्रकारिता का मतलब सिर्फ अखबार से जोड़ना गलत ही होगा। यह भी अनंत सागर है। इसी वजह से आज के दौर में हम देखे तो हर शहर में पत्रकारिता की पढ़ाई करते हुए या करने वाले मिल जाएंगे। हम यदि 10-15 साल पहले के दौर मे जाए तो हम यह बता सकते हैं कि उन दिनों में पत्रकारिता के विद्यार्थी कम ही मिलते थे। जो पत्रकार थे, वह भी हिंदी के शब्दों में पकड़ बनाने वाले महारथी थे। यह जरूरी नहीं था कि वह भी पत्रकारिता विषय से ही निकले हो। आज भी कई शख्सियतें ऐसी हैं कि जिनकी पढ़ाई में पत्रकारिता विषय कोसों दूर था, लेकिन वह आज बड़े पत्रकारों में शामिल है। अखबार की दुनिया में शब्दों की पकड़ अच्छी होना जरूरी है। अभी भी बड़े मीडिया ब्रांड स्नातक युवक को मीडिया घराने में मौका देते हैं। यहां पर यह मुद्दा नहीं होता है कि वह पत्रकारिता के बैकग्राउंड से है या नहीं। बस, शर्तें एक ही होती है कि उनमें शब्दों की पकड़ और खबरों को सूंघने की क्षमता होनी चाहिए।
कई लोग खबर उसे ही मानते हैं जिसमें खोज हो। लेकिन यह जरूरी नहीं। खबर तो वो है जो हमें खबर दे। सूचना दे। चाहे वह खोजपूर्ण हो या सूचना परक। उसका विषय भ्रष्टाचार जैसे बड़े विषय से लेकर समाज की एक छोटी बैठक भी हो सकती हैं। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में पत्रकारिता ने विस्तृत रूप ले लिया है। इसी वजह से इसकी सामान्य जानकारियां होनी जरूरी है। मीडिया के अलावा सरकारी महकमों में भी एक नई पोस्ट बनाई गई है। जिसे आईईसी कहा जाता है। जिसका विस्तृत रूप इनफॉर्मेशन, एजुकेशन और कम्यूनिकेशन है। इसके लिए बीजे और पत्रकारिता में डिप्लोमा अभ्यर्थी को मौका दिया जाता है। इसके अलावा सूचना निदेशक कार्यालय तो है ही, जिसमें पत्रकारिता से जुड़े विद्यार्थियों को मौका दिया जाता है। इसी संदर्भ में हम आज अखबार के संपादकीय विभाग में लेखन के लिए क्या टिप्स होने चाहिए, इस पर चर्चा करेंगे -
संपादकीय लेखन का मतलब सिर्फ समाचार लिखने से नहीं होना चाहिए। आजकल समाचारपत्र को बाजार में बने रहने के लिए उच्च क्वालिटी की खबरें प्रस्तुत करना जरूरी होता है। संपादकीय टीम का मूल उद्देश्य लोगों को किसी मुद्दे पर जागृत करना, उसके विचारों को प्रभावित करना और सोच को विकसित करना भी है।
हर समाचार में यह वस्तुएं होनी जरूरी होती हैं :
1. प्रस्तावना, मुख्य भाग और खबर का निष्कर्ष
2. गंभीर मसलों पर उस विषय का तर्क
3. समयानुसार खबर देना। (खबरों में समय की पाबंदी जरूरी है। क्योंकि इसमें लापरवाही हमें प्रतिद्बंद्बी से पीछे करने में प्रमुख बन सकती है)
4. मुद्दों के संभावित हल। यह ऐसे हो कि जो मजबूती प्रदर्शित करते हो।
5. प्रोफेशनल तरीके से प्रस्तुत किए गए लेखक के विचार।
- संपादकीय टीम की लेखन से ही उसकी क्षमता का भी अहसास आम पाठक को होता है। उससे यह साबित होता है कि संपादकीय मुद्दों को किसी नजर से देखता है। इसलिए बड़े मुद्दों और बड़ी खबरों में अतिरिक्त जानकारियां जरूरी होती है। जैसे कोई नई रेल शुरू हो रही है तो उस रेल के अलावा उस रूट पर चलने वाली अन्य रेलों की भी जानकारी। उस स्टेशन से गुजरने वाली रेलों की संख्या आदि-आदि।
- हर समस्या को उजागर कर संपादकीय टीम का यह उद्देश्य नहीं होता कि उस माध्यम से हल किया जाए। पहला उद्देश्य ऐसी समस्या को लाना है जो पाठक को भी मालूम न हो। अपनी खबर से उसे जानकारी मिले कि यह बड़ी समस्या भी हमारे आसपास ही थी। हां, हमें खबर ऐसी बनानी है कि इसमें लगना चाहिए कि हम इसके समाधान के लिए भी अग्रसर है।
- संपादकीय की शैली और प्रस्तुति पाठक को आकर्षित करती है। पाठक को जोड़ती है। यह सकारात्मकता के लिए प्रेरित करती है।
- अमित शाह