प्रेस रेगुलेशन : राजा राम मोहन राय ने विरोध में बंद कर दिया अपना प्रकाशन


अखबार को नियमों में बांधने वाले प्रेस रेगुलेशन एक्ट 1799 में लागू किया गया था। इसके विरोध में राजा राम मोहन राय ने अपना प्रकाशन बंद कर दिया था। इस प्री सेंसरशिप ने कई सालों तक समाजसेवी पत्रकारों को उलझाकर रखा। उनका पीछा नहीं छोड़ा। इसी रेगुलेशन में यह अनिवार्य किया था कि अखबार के पेज पर मुद्रक, संपादक और मालिक का नाम लिखना अनिवार्य है। यह तो ठीक था, लेकिन इसमें एक नियम ऐसा जोड़ा कि जो किसी को पचा नहीं। जिसमें सरकार के सचिव को अखबार छपने से पहले प्रकाशित होने वाली सामग्री जांच के लिए भेजनी थी।

राजा राम मोहन राय ने भारतीय भाषा में पारसी पत्र मीरात उल अखबार प्रकाशित किया था। इस अखबार के शुरू करने के पीछे उद्देश्य सामाजिक स्तर को सुधारना था। उन्होंने इसी अखबार के माध्यम से लोगों को सरकार की योजनाओं से संबंधित जानकारी दी। भारतीय भाषायी में समाचारपत्रों की बात करें तो इसकी शुरुआत ईसाई मिशनरियों से हुई। विलियम कैरी ने समाचार दर्पण नाम से भारतीय भाषा का अखबार निकाला।
गुजराती भाषा में 1822 को बांबे समाचार प्रकाशित हुआ। इसके आठ साल बाद ही 1830 में मुंबई वर्तमान, 1831 में जां-ए-जमशेद और इसके 19 साल बाद बांबे दर्पण शुरू किया गया। 1839 तक बांग्ला के 9 अखबार थे। 6 दैनिक ब्रिटिश अखबार थे। खास बात यह है कि इस दौरान ब्रिटिश अखबारों की कुल संख्या 26 थी। उत्तर पश्चिम से एक हिंदू और एक उर्दू अखबार था। हालांकि अंग्रेजी सरकार के युग में वही अखबार सफल हो पाए जो उनके अनुसार चलते थे। कई अखबार मालिकों को अपना प्रकाशन आर्थिक कठिनाई के साथ सरकार के सख्त नियमों के कारण बंद करने पड़े। सरकार ने उन्हीं अखबारों को टिकने दिया जो उनकी प्रशंसा किया करते थे। दूसरी बात यह भी थी कि उस दौरान सफल रहने वाले अधिकांश अखबार अंग्रेजों के हाथ में थे।

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