देश की सुरक्षा के लिए बने मीडिया कानून



सभी के हित की व्यवस्था और देश की सुरक्षा के लिए प्रेस की आजादी और नागरिक को सूचना देने का अधिकार भी सीमित होता है। आज हम इस पोस्ट के माध्यम से मीडिया कानून के बारे में चर्चा करेंगे।

भारतीय दंड संहिता 1860

निम्न मामले अपराध की श्रेणी में आते हैं
1 . दो वर्गों के बीच वैमनस्य को बढ़ावा देना।
2. वह अफवाहों के जरिए सेना को विद्रोह अथवा कर्तव्यपालन से विमुख होने के लिए बढ़ाना।
3. सरकार के खिलाफ फतवा शांति भंग के लिए लोगों को भड़काना।
4. एक समुदाय के खिलाफ दूसरे को भड़काना।
5. शब्दों या दृश्यों के जरिए एक समुदाय व्यक्ति किसी वर्ग के नागरिक की धार्मिक भावनाओं को आहत करना।

इंडियन टेलीग्राफ एक्ट 1885

यह एक्ट लोगों की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, देश की अखंडता और संप्रभुता के साथ सुरक्षा के लिए संदेशों को रोकने का अधिकार देता है। भारत में प्रकाशित होने वाले केंद्र और राज्य सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त पत्रकारों के संदेश आपातकाल के अलावा रोके नहीं जा सकते हैं। केंद्र सरकार या राज्य सरकार को आपातकाल या लोक-सुरक्षा के हित में फोन संदेश को प्रतिबंधित करने एवं उसे टेप करने तथा उसकी निगरानी का अधिकार हासिल है।

इंडियन पोस्ट ऑफिस एक्ट 1898

यह एक्ट राज्य या इसके प्रतिनिधि को अश्लील प्रकाशनों को रोकने और आगे ना भेजने का अधिकार देता है।

पुलिस वैमनस्य कानून 1922

इस एक्ट के तहत पुलिस में वैमनस्य भड़काने के लिए दंड का प्रावधान है।

सरकारी गोपनीयता अधिनियम 1923

गोपनीय सरकारी दस्तावेजों, फोटोग्राफ्स जैसे रिकॉर्ड के प्रकाशन को प्रतिबंधित करता है। यह कानून भारतीय पत्रकारों के लिए सरकार की अंदरूनी खबरें प्रकाशित करने में रोड़ा भी बनता है। अधिनियम रेंज के अंतर्गत तीन से चौदह साल की कैद की सजा शामिल है।

चमत्कारी दवा और औषधि अधिनियम 1956

यह लोगों के स्वास्थ्य के हित में यौन रोगों को चमत्कारी इलाज आदि के विज्ञापन को प्रतिबंधित करता है।

कस्टम एक्ट 1962

यह एक्ट भारत सरकार की सुरक्षा सार्वजनिक व्यवस्था नैतिकता के लिए विदेश से आयात निर्यात प्रतिबंधित करने का अधिकार देता है।

क्रिमिनल प्रोसीजर कोड 1973

यह ऐसा प्रकाशन जब्त करने का अधिकार देता है, जो भारतीय दंड संहिता के तहत सार्वजनिक व्यवस्था या राज्य की सुरक्षा के लिए खतरा हो।

बाल नुकसानदेह प्रकाशन अधिनियम 1956

यह ऐसे प्रकाशन और वितरण को प्रतिबंधित करता है, जो बच्चों को समाज विरोधी भावनाएं पैदा करता हो।

न्यायालय की अवमानना अधिनियम 1971

यह न्यायालय के आदर्शवादी की जानबूझकर अवज्ञा न्यायिक प्रक्रिया में बदलने संबंधित है। जैसे जज के निजी चैंबर में हुई सुनवाई को प्रकाशित कर देना आदि-आदि।

कॉपीराइट एक्ट 1957

यह एक्ट 1984 में संशोधित किया गया। यह लेखकों, कलाकारों, संगीतकारों, नाटककारों, फिल्म, वीडियो निर्माताओं को अपने सजन कार्य को सुरक्षा प्रदान करता है ।

महिलाओं का प्रतीक जन्म चित्रण अधिनियम 1986

इसका उद्देश्य विज्ञापन के माध्यम, प्रकाशन, लेख, रंग चित्रण में महिलाओं को अशिष्ट रूप से प्रदर्शन करने पर रोक लगाना है।

राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम 1980 गैरकानूनी

देश की सुरक्षा के लिए सरकार को अधिक शक्ति देने से संबंधित एक कानून है। यह कानून केंद्र और राज्य सरकार को गिरफ्तारी का आदेश देता है।

- अमित शाह, पत्रकार

माहौल को जीवंत कर देती हैं कठपुतलियां

कठपुतली। नाम सुनते ही जहन में ग्रामीण परिवेश का वातावरण याद आता है। संचार सुविधाओं के विकास होने से पहले गांवों और छोटे-मोटे कस्बों में सरकारी सूचना हो या सामाजिक संदेश इन कठपुतली के माध्यम से ही आम लोगों तक संपर्क बनता था। यह एक रंगमंच भी है।
कठपुतलियों को विभिन्न प्रकार की गुड्डे गुडिय़ों, जोकर आदि पात्रों के रूप में बनाया जाता है। लकड़ी से पुतली बनाई जाती थी, इसलिए इसे कठपुतली कहा जाता है। कठ शब्द काष्ठ से जुड़ा हुआ है। काष्ठ अर्थात लकड़ी। हर साल 21 मार्च को विश्व कठपुतली दिवस भी मनाया जाता है। भारत में चार प्रकार की कठपुतली प्रचलित है।
बैंकिंग और बीमा सेक्टर उत्तर प्रदेश में ग्रामीणों को बैंकिंग और जीवन बीमा के लिए जागरूक करने का अभियान कठपुतली का प्रयोग कर चलाया है। जनसंचार संस्थान ने भी पायलट स्टडी के जरिए यह पाया कि कठपुतली इतना ही प्रभावी है जितना वृत्तचित्र। दूरदर्शन में भी बच्चों को शिक्षाप्रद कहानियां सुनाने के लिए कठपुतली का प्रयोग किया जाता है। फिल्म डिविजन और बाल फिल्म सोसाइटी भी इस ओर लगातार प्रयासरत है।

पश्चिम बंगाल में छड़ कठपुतली

 पश्चिम बंगाल में कठपुतली छड़ के नाम से प्रचलित है। इसे पुतल नाच कहा जाता है। इसमें जात्रा शैली के परिधान का उपयोग किया जाता है।

प्राकृतिक रंगों से रंगी जाती है छाया पुतली

ये आंध्र प्रदेश में थोहू बोम्मालुट्‌टा, कर्नाटक में काम्बे अट्‌टा, केरल में थोलपावा कोठू और उड़ीसा में रावण छाया के नाम से प्रिय है। ये चिपटी होती है और प्राकृतिक रंगों से रंगी जाती है। इन्हें पीछे से प्रकाशित करते हैं, जिससे छाया पारदर्शी सूती कपड़े पर उभर जाती है। इसके जरिए रामायण और महाभारत की कहानियां प्रभावी ढंग से कही जाती है।

उड़ीसा में नगाड़ों के साथ हस्तपुतली

यह कला उड़ीसा, केरल और तमिलनाडु में काफी लोकप्रिय है। कठपुतली संचालक अपने हाथों के इस्तेमाल कर इन्हें बेहद जीवंत कर देता है, जो अन्यत्र संभव नहीं है। उड़ीसा में इसे संचालित करने वाला व्यक्ति साथ साथ में नगाड़ा भी बजाता है। केरल में कथकली की वेशभूषा पहनती है।

धागे से नियंत्रण होती है सूत्र-धारिका 

 इसमें धागे के सहारे से कठपुतलियों को नियंत्रित किया जाता है। राजस्थान, उड़ीसा, कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश में यह शैली ज्यादा प्रचलित है। कठपुतलियों की वेशभूषा पर उस प्रांत विशेष का असर होता है। मिसाल के तौर पर उड़ीसा में कठपुतलियां सखी कुंधेई कहलाती है। तमिलनाडु में कठपुतलियां धागे के साथ साथ छड़ से भी जुड़ी होती हैं और इनको बोम्मलअट्‌टम कहा जाता है। हर कठपुतली धागे से कठपुतली संचालक के सिर पर बंधे लोहे के छल्ले से जुड़ी होती है इससे संचालक को मनमुताबिक अपने हाथों से कठपुतली संचालित करने की छूट रहती है।

- अमित शाह

सफदर हाशमी की हत्या के बाद प्रचलित हुए थे नुक्कड़ नाटक


20-25 साल पहले देखे तो देश में नाटकों का बोलबाला ज्यादा ही था। इसे एक विस्फोटक भी कह सकते हैं। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और आंध्र ऐसे प्रदेश है, जहां पर आज भी नुक्कड़ नाटक का प्रचलन अधिक है। यहां पर नुक्कड़ नाटक के समूह अधिकांश की संख्या में सक्रिय है। एक अध्ययन के मुताबिक देशभर में सात हजार के आसपास यह समूह भारतभर में कार्यरत है। सोशल ग्रुप अपने संदेश हर डोर टू डोर पहुंचाने के लिए नुक्कड़ नाटक का प्रयोग ज्यादा कर रहे हैं। इन दिनों यह भी देखने को आया है कि कई कॉलेजों के छात्र सामाजिक संदेश देने के लिए अपने खूद की ओर से तैयार किए गए नाटक प्रस्तुत कर रहे हैं। जिनका विषय दहेज प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या, अंधविश्वास आदि को सुधारने संबंधित है।  नाटककार सफदर हाशमी की हत्या के बाद नुक्कड़ नाटकों का प्रचलन बढ़ गया। चर्चा में रहे । हाशमी को दिल्ली से सटे गाजियाबाद क्षेत्र में नुक्कड़नाटक करने के दौरान मार दिया था।
1944 में इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोसिएशन के संस्थापक बिजन भट्‌टाचार्य को संभवत: पहला नाटक प्रस्तुत करने का श्रेय जाता है। जिसे निबान खेला कहा जाता है। इसमें उन्होंने जमींदारों की ओर से किए जा रहे किसानों के शोषण के बारे में विस्तृत अभिव्यक्ति प्रस्तुत की। 
नुक्कड़ नाटक में सबसे बड़ा नाम बादल सरकार का है। सरकार ने देह भाषा और जनता पर केंद्रित संवादों के क्षेत्र में प्रभावी काम किया। नुक्कड़ नाटकों की एक विशेषता यह भी है कि इसमें लोकनृत्य, स्थानीय स्तर के संगीत और विधाएं भी स्वत: समाहित हो जाती है। उदाहरण के लिए बड़ौदा गुजरात का नाट्य समूह ही ले लेवे । इसमें गरबों का उपयोग होता है। मूल रूप से नुक्कड़ नाटकों का प्रयोग महिला शोषण, गरीबी, भेदभाव, अशिक्षा और बेरोजगारी जैसी समस्याओं पर ध्यान आकर्षित करने के लिए किया जा रहा है।

कौन है सफदर हाशमी 

 

एक प्रख्यात जनवादी, नाटककार, कलाकार, निर्देशक, गीतकार और कलाविद् थे। उनका जन्मदिन (12 अप्रैल 1954) नुक्कड़ नाटक दिवस के रूप में मनाया जाता है। सफदर हाशमी ‘जन नाट्य मंच’ और दिल्ली में स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ़ इंडिया  के संस्थापक सदस्य थे। जन नाट्य मंच (जनम) के संस्थापक सदस्य थे। यह संगठन 1973 में इप्टा से अलग होकर बना, सीटू जैसे मजदूर संगठनों के साथ जनम का अभिन्न जुड़ाव रहा। इन्होंने बहुत से गीतों, एक टेलीविजन धारावाहिक, कविताओं, बच्चों के नाटक, और डॉक्यूमेंट्री फिल्मों की विरासत सौंपी।
1975 में आपातकाल के लागू होने तक सफदर हाशमी ‘जनम’ के साथ नुक्कड़ नाटक करते रहे। अंग्रेजी साहित्य के व्याख्याता भी रहे। आपातकाल के बाद सफदर वापिस राजनैतिक तौर पर सक्रिय हो गए और 1978 तक जनम भारत में नुक्कड़ नाटक के एक महत्वपूर्ण संगठन के रूप में उभरकर आया।
1 जनवरी 1989 को जब दिल्ली से सटे साहिबाबाद के झंडापुर गांव में ग़ाज़ियाबाद नगरपालिका चुनाव के दौरान नुक्कड़ नाटक ‘हल्ला बोल’ का प्रदर्शन किया जा रहा था, तभी जनम के ग्रुप पर  कुछ लोगों ने हमला कर दिया। इस हमले में सफदर बुरी तरह से जख्मी हुए। उसी रात को सफदर की मृत्यु हो गई। इस घटना के 14 साल बाद गाजियाबाद की एक अदालत ने 10 लोगों को हत्या के मामले में आरोपी करार दिया।

- अमित शाह