भारत में धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक मकसद के हिसाब से लोक माध्यमों और पारंपरिक कलाओं का बोलबाला रहा है। लोक माध्यम से तात्कालिकता और हास्य का बखूबी से इस्तेमाल किया जाता है। यदि हम हकीकत में देखें तो लोक कलाएं ज्ञान और मंच को स्थापित करती है। हम मीडिया की दृष्टि से देखें तो यहां लोक कलाएं दर्शकों को सरकारी या गैर सरकारी कार्यप्रणाली को प्रस्तुत करती हैं। लेकिन, लोककला में यह बात ध्यान रखना जरूरी होती है कि यह माध्यम अब अभद्र नहीं बन जाए, क्योंकि आधुनिकीकरण में लोक कलाओं के प्रति सम्मान का भाव कम होता जा रहा है, जिसे हमें खासा ध्यान रखने की जरूरत है। लोक माध्यम सीधे लोगों से जुड़े हुए होते हैं। वह दिमाग तक जल्दी पहुंचते हैं, और उनका जो असर होता है वह बहुत गहरा होता है। क्योंकि विशेषकर इसमें स्थानीय बोली पर ध्यान दिया जाता है। यहां पर कम्युनिकेशन यानी संचार के दौरान होने वाली बाधा न के बराबर होती है। लोक कलाओं का विशेष फायदा यहां रहता है। छोटे से लेकर बड़ो तक, हर उम्र के शख्स तक अपना मैसेज या संदेश पहुँचता है। इसके माध्यम से बताए जाने वाले सन्देश आत्मसात करने वाले होते हैं। जैसे सामाजिक मुद्दों पर तमाशा और जात्रा अग्रणी है। भारतीय लोक माध्यमों में संगीत, हास्य, नैतिकता और प्रार्थना का विशेष रूप से समावेश होता है। हां यह जरूर है की एक ही समय में निर्धारित लोगों को ही संबोधित कर पाते हैं, लेकिन जो लोग वहां मौजूद होते हैं उन तक गहरा प्रभाव छोड़ जाते हैं। कीर्तन आल्हा नुक्कड़ नाटक इसका उदाहरण है। आजकल हम देखते हैं कई बड़े TV चैनल भी नाटक के जरिए किसी चीज को या किसी मसले को समझाने की कोशिश करते हैं। लोक कलाओं से हमारे पूर्वजों की संस्कृति को भी संवारा जा रहा है, क्योंकि इसमें नैतिक दिशा-निर्देश होते हैं । यह भी एक प्रकार का जनसंचार माध्यम है, जिसकी पहुँच देश की बड़ी संख्या में विराजित आबादी के अनुभव पर आधारित होती है। देश के हर राज्य, केंद्र शासित प्रदेश में रहने वाले लोग चाहे वह किसी भी धर्म, जाति या भाषा ही समुदाय के हो, उनमें लोक कला शामिल है। निजी संगठन भी आजकल लोग माध्यमों का प्रयोग करते हैं। देश में गीत और नाटक प्रभाग सबसे बड़ी संस्था है जो लोक माध्यमों से जुड़ी हुई होती है। यह भारत सरकार की सूचना प्रसारण मंत्रालय की ही इकाई है। मंत्रालय के प्रकाशन इस इकाई को लाइव मीडिया विंग कहते हैं, जो पारंपरिक एवं अन्य कलाओं को सामाजिक संचार करता है । यह शहर की तुलना में गांवों में ही ज्यादा सक्रिय हैं। उसका मुख्यालय दिल्ली में है। प्रभाग के पास 40 मंडलियां है। इसके अलावा हम देखते हैं कि गांवों में भी कई सरकारी कार्यालय द्वारा अपनी योजनाओं के प्रचार प्रसार के लिए नाटक नुक्कड़ का सहयोग लिया जाता है।
पूर्वजों की संस्कृति संवारती लोककला
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पत्रकारिता का इतिहास
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