माहौल को जीवंत कर देती हैं कठपुतलियां

कठपुतली। नाम सुनते ही जहन में ग्रामीण परिवेश का वातावरण याद आता है। संचार सुविधाओं के विकास होने से पहले गांवों और छोटे-मोटे कस्बों में सरकारी सूचना हो या सामाजिक संदेश इन कठपुतली के माध्यम से ही आम लोगों तक संपर्क बनता था। यह एक रंगमंच भी है।
कठपुतलियों को विभिन्न प्रकार की गुड्डे गुडिय़ों, जोकर आदि पात्रों के रूप में बनाया जाता है। लकड़ी से पुतली बनाई जाती थी, इसलिए इसे कठपुतली कहा जाता है। कठ शब्द काष्ठ से जुड़ा हुआ है। काष्ठ अर्थात लकड़ी। हर साल 21 मार्च को विश्व कठपुतली दिवस भी मनाया जाता है। भारत में चार प्रकार की कठपुतली प्रचलित है।
बैंकिंग और बीमा सेक्टर उत्तर प्रदेश में ग्रामीणों को बैंकिंग और जीवन बीमा के लिए जागरूक करने का अभियान कठपुतली का प्रयोग कर चलाया है। जनसंचार संस्थान ने भी पायलट स्टडी के जरिए यह पाया कि कठपुतली इतना ही प्रभावी है जितना वृत्तचित्र। दूरदर्शन में भी बच्चों को शिक्षाप्रद कहानियां सुनाने के लिए कठपुतली का प्रयोग किया जाता है। फिल्म डिविजन और बाल फिल्म सोसाइटी भी इस ओर लगातार प्रयासरत है।

पश्चिम बंगाल में छड़ कठपुतली

 पश्चिम बंगाल में कठपुतली छड़ के नाम से प्रचलित है। इसे पुतल नाच कहा जाता है। इसमें जात्रा शैली के परिधान का उपयोग किया जाता है।

प्राकृतिक रंगों से रंगी जाती है छाया पुतली

ये आंध्र प्रदेश में थोहू बोम्मालुट्‌टा, कर्नाटक में काम्बे अट्‌टा, केरल में थोलपावा कोठू और उड़ीसा में रावण छाया के नाम से प्रिय है। ये चिपटी होती है और प्राकृतिक रंगों से रंगी जाती है। इन्हें पीछे से प्रकाशित करते हैं, जिससे छाया पारदर्शी सूती कपड़े पर उभर जाती है। इसके जरिए रामायण और महाभारत की कहानियां प्रभावी ढंग से कही जाती है।

उड़ीसा में नगाड़ों के साथ हस्तपुतली

यह कला उड़ीसा, केरल और तमिलनाडु में काफी लोकप्रिय है। कठपुतली संचालक अपने हाथों के इस्तेमाल कर इन्हें बेहद जीवंत कर देता है, जो अन्यत्र संभव नहीं है। उड़ीसा में इसे संचालित करने वाला व्यक्ति साथ साथ में नगाड़ा भी बजाता है। केरल में कथकली की वेशभूषा पहनती है।

धागे से नियंत्रण होती है सूत्र-धारिका 

 इसमें धागे के सहारे से कठपुतलियों को नियंत्रित किया जाता है। राजस्थान, उड़ीसा, कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश में यह शैली ज्यादा प्रचलित है। कठपुतलियों की वेशभूषा पर उस प्रांत विशेष का असर होता है। मिसाल के तौर पर उड़ीसा में कठपुतलियां सखी कुंधेई कहलाती है। तमिलनाडु में कठपुतलियां धागे के साथ साथ छड़ से भी जुड़ी होती हैं और इनको बोम्मलअट्‌टम कहा जाता है। हर कठपुतली धागे से कठपुतली संचालक के सिर पर बंधे लोहे के छल्ले से जुड़ी होती है इससे संचालक को मनमुताबिक अपने हाथों से कठपुतली संचालित करने की छूट रहती है।

- अमित शाह

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